गोड्डा से बड़ी खबर | IN TV
गोड्डा (Godda): झारखण्ड के गोड्डा में विकास के नाम पर खर्च हो रही सरकारी राशि की गुणवत्ता पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। आजादी के बाद पहली बार बन रही सड़क और लागत करीब 1 करोड़ 40 लाख रुपये! उम्मीद थी कि इस सड़क से वर्षों की परेशानी दूर होगी, लेकिन निर्माण शुरू होते ही गुणवत्ता को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
मामला कालीपीठ से धर्मोडीह कचरा प्लांट तक बन रही पीसीसी सड़क का है। नगर परिषद की ओर से टेंडर के माध्यम से कराए जा रहे इस निर्माण कार्य में घटिया सामग्री के इस्तेमाल और प्राक्कलन की अनदेखी किए जाने का आरोप लगा है। सवाल सिर्फ सड़क की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि जनता के पैसे के सही इस्तेमाल का भी है।
निर्माण स्थल पर पहुंचे मुखिया, कैमरे में दर्ज की स्थिति
निर्माण कार्य में कथित अनियमितता की शिकायत मिलने के बाद पांडुबथान पंचायत के मुखिया संजय सिंह ने खुद मोर्चा संभाला। वह निर्माण स्थल पर पहुंचे और काम की गुणवत्ता तथा इस्तेमाल की जा रही सामग्री पर सवाल उठाए। उन्होंने मौके की स्थिति को कैमरे में भी रिकॉर्ड किया।
मुखिया का आरोप है कि निर्माण कार्य निर्धारित तकनीकी मानकों और प्राक्कलन के अनुरूप नहीं कराया जा रहा है। सड़क निर्माण की जिम्मेदारी महगामा निवासी संवेदक शाकिर अंसारी को दी गई है।
शिकायत होते ही बंद हुआ काम, अब जांच का इंतजार
मामले की जानकारी संबंधित विभाग को देकर मुखिया ने निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। शिकायत के बाद फिलहाल निर्माण कार्य बंद करा दिया गया है। अब सवाल है कि यदि सब कुछ प्राक्कलन के मुताबिक हो रहा था, तो गुणवत्ता को लेकर इतनी गंभीर शिकायतें क्यों उठीं?
1.40 करोड़ की योजना, जवाबदेही किसकी?
धर्मोडीह पंचायत क्षेत्र में नगर परिषद का कचरा डंप किया जाता है। कचरा प्लांट तक बेहतर आवागमन के उद्देश्य से इस सड़क का निर्माण कराया जा रहा है। लेकिन जिस योजना से लोगों को बेहतर सुविधा मिलने की उम्मीद थी, वही योजना अब सवालों के घेरे में है।
अब निगाहें विभागीय जांच पर टिकी हैं। क्या निर्माण सामग्री की तकनीकी जांच होगी? क्या सड़क की मोटाई, गुणवत्ता और प्राक्कलन का मिलान कराया जाएगा? अगर अनियमितता प्रमाणित होती है तो क्या संवेदक के साथ जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई होगी?
जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?
फिलहाल आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी। लेकिन इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—विकास योजनाओं में करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद गुणवत्ता की निगरानी की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
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