पाकुड़ (Pakur): झारखण्ड के पाकुड़ जिले के अमड़ापाड़ा मे कोयला खनन के विस्तार के बीच अमड़ापाड़ा में विस्थापन का दर्द एक बार फिर सामने आया है। शुक्रवार को झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी पचुवाड़ा नॉर्थ एवं सेंट्रल कोल परियोजना क्षेत्र के विस्थापित गांवों में पहुंचे और प्रभावित परिवारों से सीधे मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनीं।
मरांडी ने चिलगो, बिशनपुर, कटालडीह समेत आसपास के गांवों का दौरा किया। इस दौरान विस्थापित परिवारों ने जमीन अधिग्रहण, रोजगार, पुनर्वास, आवास, बच्चों की शिक्षा और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ी समस्याएं उनके सामने रखीं।
विस्थापितों का कहना था कि जमीन चली गई, लेकिन उसके बदले मिलने वाली व्यवस्था से भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकी है। वर्षों से जिस जमीन पर खेती और परिवार की आजीविका निर्भर थी, उसके अधिग्रहण के बाद रोजगार और स्थायी आय का संकट खड़ा हो गया है।
जमीन गई तो रोजगार कब मिलेगा?
विस्थापित परिवारों ने रोजगार को सबसे बड़ी समस्या बताते हुए कहा कि परियोजना को शुरू हुए कई वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन प्रभावित परिवारों के सभी सदस्यों को स्थायी और सम्मानजनक रोजगार नहीं मिल सका है।
लोगों ने कहा कि जमीन के बदले मिलने वाला मुआवजा या तत्काल राहत पर्याप्त नहीं है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिससे विस्थापित परिवार लंबे समय तक आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रह सकें।
118 परिवारों की कॉलोनी का भी किया निरीक्षण
दौरे के दौरान बाबूलाल मरांडी ने चिलगो में विस्थापित 118 परिवारों के लिए बनाई गई कॉलोनी का जायजा लिया। उन्होंने कॉलोनी में रह रहे परिवारों से बातचीत कर उनकी वास्तविक स्थिति को समझा।
परिवारों ने बताया कि प्रत्येक परिवार को मकान के लिए सात डिसमिल जमीन उपलब्ध कराई गई है। हालांकि संयुक्त परिवारों के लिए यह जगह भविष्य की जरूरतों के लिहाज से पर्याप्त नहीं मानी जा रही है।
विस्थापितों का सवाल साफ था—आज माता-पिता और बच्चे किसी तरह रह रहे हैं, लेकिन जब बच्चे बड़े होंगे और उनके अपने परिवार होंगे, तब उनके रहने की व्यवस्था क्या होगी?
‘आज मिला घर, लेकिन अगली पीढ़ी का क्या?’
विस्थापित परिवारों ने पुनर्वास की मौजूदा व्यवस्था को लेकर दीर्घकालिक योजना की जरूरत बताई। उनका कहना था कि पुनर्वास का आकलन केवल आज के परिवार के आधार पर नहीं होना चाहिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।
बच्चों की शिक्षा को लेकर भी परिवारों ने चिंता जताई। लोगों का कहना था कि खनन परियोजना शुरू हुए छह-सात वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा और पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था अभी भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है।
‘पुनर्वास में कम से कम चार पीढ़ियों का भविष्य देखना चाहिए’
विस्थापितों की समस्याएं सुनने के बाद बाबूलाल मरांडी ने कहा कि पुनर्वास का मतलब सिर्फ मकान बनाकर दे देना नहीं है। जमीन अधिग्रहण का प्रभाव केवल वर्तमान परिवार पर नहीं पड़ता, बल्कि आने वाली पीढ़ियां भी उससे प्रभावित होती हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार को पुनर्वास नीति बनाते समय कम से कम अगली चार पीढ़ियों के भविष्य को ध्यान में रखना चाहिए। प्रभावित परिवारों के लिए आवास के साथ शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक-सांस्कृतिक अधिकारों की भी ठोस व्यवस्था होनी चाहिए।
रोटी, कपड़ा और मकान से आगे की सोच जरूरी
मरांडी ने कहा कि विकास परियोजनाएं जरूरी हैं, लेकिन विकास की कीमत विस्थापित परिवारों की आने वाली पीढ़ियों को नहीं चुकानी चाहिए। यदि किसी परिवार की जमीन विकास परियोजना के लिए ली जाती है तो सरकार की जिम्मेदारी है कि उसके भविष्य की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे।
उन्होंने झारखंड में आदिवासी आबादी के घटते अनुपात पर भी चिंता जताई और कहा कि विस्थापन के बाद केवल तत्काल राहत देना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और सांस्कृतिक अधिकारों को पुनर्वास का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
मरांडी के दौरे के दौरान विस्थापित परिवारों ने उम्मीद जताई कि उनकी समस्याएं शासन-प्रशासन तक पहुंचेंगी और पुनर्वास, रोजगार तथा भविष्य की सुरक्षा को लेकर स्थायी समाधान की दिशा में ठोस पहल होगी।
Desk Report By in Tv








